शनिवार, 23 जनवरी 2016

हिन्दू धर्म के 12 चमत्कार जानकर रह जाएंगे हैरान

हिन्दू धर्म एक जाग्रत, रूहानी और रहस्यों से भरा धर्म है। हिन्दू धर्म की हर परंपरा, रीति-रिवाज, सिद्धांत, दर्शन आदि सभी में ज्ञान और विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। 90,000 वर्ष से चली आ रही इस प्राचीन परंपरा के वटवृक्ष पर हजारों लताएं उग आई हैं, लेकिन वे सभी वटवृक्ष का ही हिस्सा हों, ऐसा नहीं है। उक्त लताओं को देखकर यह नहीं मानना चाहिए कि ये जंगली लताएं ही हिन्दू धर्म हैं। हजारों वर्षों की परंपरा में वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, नाथ, संत, स्मार्त आदि कई संप्रदायों के मठ, मंदिर, सिद्धपीठ, ज्योतिर्लिंग और गुफाएं निर्मित होती गईं। सभी में ध्यान, तप, भक्ति और क्रिया योग को महत्व दिया जाता रहा है।
इस दौरान लाखों चमत्कारिक और सिद्ध संत हुए। भारत अध्यात्म की एक राजधानी बन गया और बौद्ध काल में यहीं से धर्म, दर्शन, ज्ञान, विज्ञान आदि का निर्यात हुआ। खैर... हम यहां जानते हैं हिन्दुओं के ऐसे चमत्कारों के बारे में जिन्हें जानकर आप दंग रह जाएंगे।

अमरनाथ में शिवलिंग : 

केदारनाथ से आगे है अमरनाथ और उससे आगे है कैलाश पर्वत। बाबा अमरनाथ को आजकल स्थानीय मुस्लिम लोगों के प्रभाव के कारण 'बर्फानी बाबा' कहा जाता है, जो कि अनुचित है। यह शिवजी का अपमान है। यहां प्राकृतिक रूप से बर्फ से शिवलिंग निर्मित होते हैं। शिवलिंग का निर्मित होना समझ में आता है, लेकिन इस पवित्र गुफा में हिम शिवलिंग के साथ ही एक गणेश पीठ व एक पार्वती पीठ भी हिम से प्राकृतिक रूप में निर्मित होता है। पार्वती पीठ ही शक्तिपीठ स्थल है। यहां माता सती के कंठ का निपात हुआ था। पार्वती पीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां माता के अंग तथा अंगभूषण की पूजा होती है। ऐसे बहुत से तीर्थ हैं, जहां प्राचीनकाल में सिर्फ साधु-संत ही जाते थे और वहां जाकर वे तपस्या करते थे।बाबा अमरकथा : इस पवित्र गुफा में भगवान शंकर ने भगवती पार्वती को मोक्ष का मार्ग दिखाया था। इस तत्वज्ञान को 'अमरकथा' के नाम से जाना जाता है इसीलिए इस स्थान का नाम 'अमरनाथ' पड़ा। यह कथा भगवती पार्वती तथा भगवान शंकर के बीच हुआ संवाद है। यह उसी तरह है जिस तरह कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद हुआ था। सती ने दूसरा जन्म हिमालय राज के यहां पार्वती के रूप में लिया। पहले जन्म में वे दक्ष की पुत्री थीं तथा दूसरे जन्म में वे दुर्गा बनीं। एक बार पार्वतीजी ने शंकरजी से पूछा, 'मुझे इस बात का बड़ा आश्चर्य है कि आपके गले में नरमुंड माला क्यों है?' भगवान शंकर ने बताया, 'पार्वती! जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।' पार्वती बोली, 'मेरा शरीर नाशवान है, मृत्यु को प्राप्त होता है, परंतु आप अमर हैं, इसका कारण बताने का कष्ट करें। मैं भी अजर-अमर होना चाहती हूं?' भगवान शंकर ने कहा, 'यह सब अमरकथा के कारण है...।' यह सुनकर पार्वतीजी ने शिवजी से कथा सुनाने का आग्रह किया। बहुत वर्षों तक भगवान शंकर ने इसे टालने का प्रयास किया, लेकिन जब पार्वतीजी की जिज्ञासा बढ़ गई, तब उन्हें लगा कि अब कथा सुना देना चाहिए। अब सवाल यह था कि अमरकथा सुनाते वक्त कोई अन्य जीव इस कथा को न सुने इसीलिए भगवान शंकर 5 तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्रि) का परित्याग करके इन पर्वतमालाओं में पहुंच गए और अमरनाथ गुफा में भगवती पार्वतीजी को अमरकथा सुनाने लगे। अमरनाथ गुफा की ओर जाते हुए वे सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे, जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। तत्पश्चात चंदनवाड़ी में उन्होंने अपनी जटा (केशों) से चन्द्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंचकर उन्होंने अपने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र गणेशजी को भी उन्होंने महागुनस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी पहुंचकर शिवजी ने पांचों तत्वों का परित्याग किया। सबकुछ छोड़कर अंत में भगवान शिव ने इस अमरनाथ गुफा में प्रवेश किया और पार्वतीजी को अमरकथा सुनाने लगे। शुकदेव : जब भगवान शंकर इस अमृत ज्ञान को भगवती पार्वती को सुना रहे थे तो वहां एक शुक (हरा कठफोड़वा या हरी कंठी वाला तोता) का बच्चा भी यह ज्ञान सुन रहा था। पार्वतीजी कथा सुनने के बीच-बीच में हुंकारा भरती थीं। पार्वतीजी को कथा सुनते-सुनते नींद आ गई और उनकी जगह पर वहां बैठे एक शुक ने हुंकारी भरना प्रारंभ कर दिया। जब भगवान शिव को यह बात ज्ञात हुई, तब वे शुक को मारने के लिए दौड़े और उसके पीछे अपना त्रिशूल छोड़ा। शुक जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागता रहा। भागते-भागते वह व्यासजी के आश्रम में आया और सूक्ष्म रूप बनाकर उनकी पत्नी वटिका के मुख में घुस गया। वह उनके गर्भ में रह गया। ऐसा कहा जाता है कि ये 12 वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले और व्यासजी के पुत्र कहलाए। पवित्र युगल कबूतर : श्री अमरनाथ की यात्रा के साथ ही कबूतरों की कथा भी जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार एक समय महादेव संध्या के समय नृत्य कर रहे थे कि भगवान शिव के गण आपस में ईर्ष्या के कारण 'कुरु-कुरु' शब्द करने लगे। महादेव ने उनको श्राप दे दिया कि तुम दीर्घकाल तक यह शब्द 'कुरु-कुरु' करते रहो। तदुपरांत वे रुद्ररूपी गण उसी समय कबूतर हो गए और वहीं उनका स्थायी निवास हो गया। माना जाता है ‍कि यात्रा के दौरान पावन अमरनाथ गुफा में इन्हीं दोनों कबूतरों के भी दर्शन होते हैं। यह आश्चर्य ही है कि जहां ऑक्सीजन की मात्रा नहीं के बराबर है और जहां दूर-दूर तक खाने-पीने का कोई साधन नहीं है, वहां ये कबूतर किस तरह रहते होंगे? यहां कबूतरों के दर्शन करना शिव और पार्वती के दर्शन करना माना जाता है। पार्वतीजी भगवान सदाशिव से कहती हैं- 'प्रभो! मैं अमरेश महादेव की कथा सुनना चाहती हूं। मैं यह भी जानना चाहती हूं कि महादेव गुफा में स्थित होकर अमरेश क्यों और कैसे कहलाए?' सदाशिव भोलेनाथ बोले, 'देवी! आदिकाल में ब्रह्मा, प्रकृति, स्थावर (पर्वतादि) जंगल, (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, कूष्मांड, भैरव, गीदड़, दानव आदि की उत्पत्ति हुई। इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टि हुई, परंतु इंद्रादि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में थे।' इसके बाद भगवान भोलेनाथ ने कहा कि मृत्यु से भयभीत देवता उनके पास आए। सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की और कहा कि 'हमें मृत्यु बाधा करती है। आप कोई ऐसा उपाय बतलाएं जिससे मृत्यु हमें बाधा न करे।' 'मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा', कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चन्द्रमा की कला को उतारकर निचोड़ा और देवगणों से बोले, 'यह आप लोगों के मृत्युरोग की औषधि है।' उस चन्द्रकला के निचोड़ने से पवित्र अमृत की धारा बह निकली और वही धारा बाद में अमरावती नदी के नाम से विख्यात हुई। चन्द्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर पर जो अमृत बिंदु गिरे, वे सूख गए और पृथ्वी पर गिर पड़े। पावन गुफा में जो भस्म है, वे इसी अमृत बिंदु के कण हैं, जो पृथ्वी पर गिरे थे। सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्योछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए। देवगण सदाशिव को जलस्वरूप देखकर उनकी स्तुति में लीन हो गए और बारम्बार नमस्कार करने लगे। भोलेनाथ ने देवताओं से कहा, 'हे देवताओं! तुमने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा। अब तुम यहीं पर अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाओ। आज से मेरा यह अनादि लिंग शरीर तीनों लोकों में 'अमरेश' के नाम से विख्यात होगा।' देवताओं को ऐसा वर देकर सदाशिव उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव ने अमृत रूप सोमकला को धारण कर देवताओं की मृत्यु का नाश किया, तभी से उनका नाम 'अमरेश्वर' प्रसिद्ध हुआ।


21 सितंबर 1995 में दुनिया का सबसे महान धार्मिक चमत्कार तब घटित हुआ था जब दुनियाभर की मूर्तियों ने दूध पीना शुरु कर दिया था। इसके बाद यही घटन दोबारा घटी 2006 में। भारत सहित नेपाल, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि सभी जगह पर हिन्दू देवी और देवताओं ने दूध पिया था, जिसका भारत के सभी न्यूज चैनलों सहित बीबीसी, सीएनएन, वॉशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क टाइम्स, डेली एक्सप्रेस आदि दुनियाभर के अखबारों और चैनलों ने इसको कवरेज किया था। लेकिन कोई भी उस वक्त नहीं बता पाया कि आखिर यह चमत्कार कैसे घटित हो रहा है। दिन भर चले इस चमत्कार के दौरान मूर्तियों ने कई किलो दूध पिया और न मालूम दूध कहां गायब हो गया। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाय कि हो सकता है कि शायद गर्मी के कारण मूर्तियों की नमी समाप्त हो गई हो और इस वजह से ऐसे संभव हुआ हो। कुछ ने कहा कि यह पृष्ठतनाव या सतह तनाव (Surface Tension) की प्रक्रिया है। दूध धार के रूप में मूर्ति से गिरकर नीचे जमीन में चला जाता है, लेकिन जांच करने के बाद पता चला की ऐसे नहीं था। कुछ ने इसे केशिका की कार्रवाई (Capillary Action) कहकर इसे झुठलाने का प्रयास किया, लेकिन वे इसे साबित नहीं कर पाए कि क्विंटलों से पिलाया जा रहा दूध आखिर गायब कहां हो गया? आज तक इसका रहस्य बरकरार है..

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माता के इस स्थान पर अज्ञात काल से ज्वाला निकल रही है इसी कारण इसे ज्वालादेवी का मंदिर कहते हैं। ज्वालादेवी का मंदिर भी 51 शक्तिपीठों में से एक है, जो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कालीधार पहाड़ी के बीच बसा हुआ है। शास्त्रों के अनुसार ज्वालादेवी में माता सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। ज्वालामुखी मंदिर को ज्योता वाली का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। मंदिर की चोटी पर सोने की परत चढ़ी हुई है। ज्वालादेवी मंदिर में सदियों से बिना तेल-बाती के प्राकृतिक रूप से 9 ज्वालाएं जल रही हैं। 9 ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला माता, जो चांदी के दीये के बीच स्थित है, उसे महाकाली कहते हैं। अन्य 8 ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी देवी ज्वालादेवी मंदिर में निवास करती हैं। ज्वालादेवी शक्तिपीठ में माता की ज्वाला के अलावा एक अन्य चमत्कार देखने को मिलता है। मंदिर परिसर के पास ही एक जगह 'गोरख डिब्बी' है। देखने पर लगता है कि इस कुंड में गर्म पानी खौलता हुआ होगा, जबकि छूने पर कुंड का पानी ठंडा लगता है। इसे गोरखनाथ का मंदिर कहते हैं। एक किंवदंती के अनुसार माता के अनन्य भक्त गुरु गोरखनाथ ने यहां माता की खूब सेवा की थी और वे माता के साक्षात दर्शन भी करते थे। एक बार गोरखनाथ को भूख लगी तब उन्होंने माता से कहा कि आप आग जलाकर पानी गर्म करें, मैं भिक्षा मांगकर लाता हूं। मां ने अपने पुत्र के कहे अनुसार आग जलाकर पानी गर्म किया और गोरखनाथ का इंतजार करने लगीं, पर गोरखनाथ अभी तक लौटकर नहीं आए। कहते हैं कि आज भी माता ज्वाला जलाकर अपने भक्त का इंतजार कर रही हैं। ऐसा माना जाता है कि जब कलियुग खत्म होकर फिर से सतयुग आएगा, तब गोरखनाथ लौटकर मां के पास आएंगे।

कालभैरव का मंदिर

मध्यप्रदेश के उज्जैन में कालभैरव का मंदिर है। यहां भगवान कालभैरव की मूर्ति चमत्कारिक रूप से मदिरापान करती है। वैज्ञानिक जांच और शोध के बाद आज तक इस मूर्ति का रहस्य पता नहीं चला है। कहा जाता है कि कालभैरव का यह मंदिर लगभग 6,000 साल पुराना है। यह एक वाममार्गी तांत्रिक मंदिर है। कालभैरव के मदिरापान के पीछे क्या राज है? इसे लेकर लंबी-चौड़ी बहस हो चुकी है। पीढ़ियों से इस मंदिर की सेवा करने वाले राजुल महाराज बताते हैं कि उनके दादा के जमाने में एक अंग्रेज अधिकारी ने मंदिर की खासी जांच करवाई थी, लेकिन कुछ भी उसके हाथ नहीं लगा। उसने प्रतिमा के आसपास की जगह की खुदाई भी करवाई, लेकिन नतीजा सिफर। उसके बाद वे भी कालभैरव के भक्त बन गए। उनके बाद से ही यहां देसी मदिरा को वाइन उच्चारित किया जाने लगा, जो आज तक जारी है। कालभैरव को मदिरा पिलाने का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। यह कब, कैसे और क्यों शुरू हुआ, यह कोई नहीं जानता। यहां आने वाले लोगों और पंडितों का कहना है कि वे बचपन से भैरव बाबा को भोग लगाते आ रहे हैं जिसे वे खुशी-खुशी ग्रहण भी करते हैं। उनके बाप-दादा भी उन्हें यही बताते हैं कि यह एक तांत्रिक मंदिर था, जहां बलि चढ़ाने के बाद बलि के मांस के साथ-साथ भैरव बाबा को मदिरा भी चढ़ाई जाती थी। अब बलि तो बंद हो गई है, लेकिन मदिरा चढ़ाने का सिलसिला वैसे ही जारी है। इस मंदिर की महत्ता को प्रशासन की भी मंजूरी मिली हुई है। खास अवसरों पर प्रशासन की ओर से भी बाबा को मदिरा चढ़ाई जाती है।

भगवान जगन्नाथ का मंदिर

भारतीय राज्य ओडिशा के नगर पुरी के तट पर भगवान जगन्नाथ का एक प्राचीन मंदिर स्थापित है। इस मंदिर के कई चमत्कार आज भी विद्यमान हैं। पहला यह कि इस मंदिर के गुंबद की छाया नहीं बनती, दूसरा यह कि इस मंदिर के शिखर का ध्वज हवा की विपरीत दिशा में लहराता है और तीसरा यह कि इस मंदिर के गुंबद के आसपास कोई पक्षी नहीं उड़ता है। जानिए जगन्नाथ मंदिर के 10 चमत्कार इसी तरह इस मंदिर के और भी कई चमत्कार हैं जिन्हें जानकर आप हैरान रह जाएंगे। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। जगन्नाथ मंदिर विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है।
भारत के पूर्व में बंगाल की खाड़ी के पूर्वी छोर पर बसी पवित्र नगरी पुरी ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से थोड़ी दूरी पर है। आज का ओडिशा प्राचीनकाल में 'उत्कल प्रदेश' के नाम से जाना जाता था। यहां देश की समृद्ध बंदरगाहें थीं, जहां जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, थाईलैंड और अन्य कई देशों का इन्हीं बंदरगाह के रास्ते व्यापार होता था। पुराणों में इसे 'धरती का वैकुंठ' कहा गया है।


मैहर माता का मंदिर : 

मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले में मैहर की माता शारदा का प्रसिद्ध मंदिर है। मान्यता है कि शाम की आरती होने के बाद जब मंदिर के कपाट बंद करके सभी पुजारी नीचे आ जाते हैं तब यहां मंदिर के अंदर से घंटी और पूजा करने की आवाज आती है। कहते हैं कि मां के भक्त आल्हा अभी भी पूजा करने आते हैं। अक्सर सुबह की आरती वे ही करते हैं। पिरामिडाकार त्रिकूट पर्वत में विराजीं मां शारदा का यह मंदिर 522 ईसा पूर्व का है। कहते हैं कि 522 ईसा पूर्व चतुर्दशी के दिन नृपल देव ने यहां सामवेदी की स्थापना की थी, तभी से त्रिकूट पर्वत में पूजा-अर्चना का दौर शुरू हुआ। इस मंदिर की पवित्रता का अंदाजा महज इस बात से लगाया जा सकता है कि अभी भी आल्हा मां शारदा की पूजा करने सुबह पहुंचते हैं। मां शारदा की प्रतिमा के ठीक नीचे के न पढ़े जा सके शिलालेख भी कई पहेलियों को समेटे हुए हैं। सन् 1922 में जैन दर्शनार्थियों की प्रेरणा से तत्कालीन महाराजा ब्रजनाथ सिंह जूदेव ने शारदा मंदिर परिसर में जीव बलि को प्रतिबंधित कर दिया था। विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर के बारे मान्यता है कि मां शारदा की प्रथम पूजा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी। मैहर पर्वत का नाम प्राचीन धर्मग्रंथ 'महेन्द्र' में मिलता है। इसका उल्लेख भारत के अन्य पर्वतों के साथ पुराणों में भी आया है। जनश्रुतियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मैहर नगर का नाम मां शारदा मंदिर के कारण ही अस्तित्व में आया। हिन्दू श्रद्धालुजन देवी को मां अथवा माई के रूप में परंपरा से संबोधित करते चले आ रहे हैं। माई का घर होने के कारण पहले माई घर तथा इसके उपरांत इस नगर को मैहर के नाम से संबोधित किया जाने लगा। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान शंकर के तांडव नृत्य के दौरान उनके कंधे पर रखे माता सती के शव से गले का हार त्रिकूट पर्वत के शिखर पर आ गिरा। इसी वजह से यह स्थान शक्तिपीठ तथा नाम माई का हार के आधार पर मैहर के रूप में विकसित हुआ। कई रहस्य आज भी बरकरार : ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस तथ्य का प्रमाण प्राप्त होता है कि सन् 539 (522 ईपू) चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नृपलदेव ने सामवेदी देवी की स्थापना की थी। प्रसिद्ध इतिहासविद् ए. कनिंघम द्वारा मां शारदा मंदिर का काफी अध्ययन किया गया है। मैहर स्थित जन सूचना केंद्र के प्रभारी पंडित मोहनलाल द्विवेदी शिलालेख के हवाले से बताते हैं कि कनिंघम के प्रतीत होने वाले 9वीं व 10वीं सदी के शिलालेख की लिपि न पढ़े जाने के कारण अभी भी रहस्य बने हुए हैं।

चौतरफा हैं प्राचीन धरोहरें :

 मैहर केवल शारदा मंदिर के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है बल्कि इसके चारों ओर प्राचीन धरोहरें बिखरी पड़ी हैं। मंदिर के ठीक पीछे इतिहास के दो प्रसिद्ध योद्धाओं व देवी भक्त आल्हा- ऊदल के अखाड़े हैं तथा यहीं एक तालाब और भव्य मंदिर है जिसमें अमरत्व का वरदान प्राप्त आल्हा की तलवार उसी की विशाल प्रतिमा के हाथ में थमाई गई है। मैहर मंदिर के महंत पंडित देवी प्रसाद बताते हैं कि अभी भी मां का पहला श्रृंगार आल्हा ही करते हैं और जब ब्रह्म मुहूर्त में शारदा मंदिर के पट खोले जाते हैं तो पूजा की हुई मिलती है। इस रहस्य को सुलझाने हेतु वैज्ञानिकों की टीम भी डेरा जमा चुकी है लेकिन रहस्य अभी भी बरकरार है। इसके अलावा 950 ईसा पूर्व चंदेल राजपूत वंश द्वारा बनाया गया गोलामठ मंदिर, 108 शिवलिंगों का रामेश्वरम मंदिर, भदनपुर में राजा अमान द्वारा स्थापित किया गया हनुमान मंदिर अन्य धार्मिक केंद्र हैं। इसके अतिरिक्त मैहर क्षेत्र के ग्राम मड़ई, मनौरा, तिदुंहटा व बदेरा में सदियों पुराने भवन व शिलालेख हैं, जो भारतीय इतिहास को एक नए आलोक में झांकने का अवसर प्रदान करते हैं। शिव पुराण के मुताबिक बदेरा में ही शिवभक्त बाणासुर की राजधानी थी जिसकी पुष्टि बदेरा के जंगल में जगह-जगह मिल रहे शिव मंदिरों के भग्नावशेष व शिवलिंग करते हैं।
केदारनाथ मंदिर एक चमत्कारिक मंदिर है। पांडवों द्वारा निर्मित इस मंदिर का शंकराचार्य के बाद राजा भोज ने जीर्णोद्धार करवाया था। शंकराचार्य ने यहां तप किया और यह भी कहते हैं कि ठीक मंदिर के पीछे उनकी समाधि है। इस मंदिर की वे ही रक्षा करते हैं। ऐसे कई मौके आए जबकि यह मंदिर नष्ट हो जाता, लेकिन यह मंदिर आज भी जस का तस खड़ा है। जुलाई 2013 में केदारनाथ में जो जलप्रलय हुई थी उसमें लगभग 10,000 लोग मौत की नींद में सो गए थे लेकिन मंदिर का बाल भी बांका नहीं हुआ। और तो और, मंदिर को बचाने के लिए पहाड़ी पर से एक विशालकाय और लंबी शिला गिरी और लुढ़कती हुई ठीक मंदिर के पीछे शंकराचार्यजी की समाधि के पास आकर अचानक रुक गई। इस शिला के आसपास से बाढ़ का पानी रातभर गुजरता रहा और इस शिला ने ऊपर से आ रहे कई छोटे और बड़े पत्थरों से भी मंदिर की रक्षा की। केदारनाथ उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है। केदारनाथ धाम और मंदिर 3 तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड। न सिर्फ 3 पहाड़ बल्कि 5 ‍नदियों का संगम भी है यहां- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी।
इन नदियों में से कुछ का अब अस्तित्व नहीं रहा लेकिन अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है। इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी रहता है। समुद्र तल से 3,584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहां पहुंचना सबसे कठिन है।

रामेश्वरम

ये सभी जानते हैं कि रामेश्वरम में भगवान श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना की थी। यहीं आगे श्रीराम ने क्रोधवश समुद्र को सुखाने के लिए अपना धनुष निकाल लिया था जिससे डरकर समुद्रदेव ने प्रकट होकर उनसे क्षमा-याचना की थी। कहते हैं कि आज भी रामेश्‍वरम में समुद्र अपने पूरे अदब और संयम के साथ ही रहता है। यहां समुद्र कभी उफान पर नहीं आता है। हिन्दुओं के 4 धामों में से 1 रामेश्वरम का शिवलिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से 1 है। यह तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। मन्नार की खाड़ी में स्थित द्वीप जहां भगवान राम का लोक-प्रसिद्ध विशाल मंदिर है। श्रीरामेश्वरमजी का मंदिर 1,000 फुट लंबा, 650 फुट चौड़ा तथा 125 फुट ऊंचा है। इस मंदिर में प्रधान रूप से एक हाथ से भी कुछ अधिक ऊंची शिवजी की लिंग मूर्ति स्थापित है।

पूरी दुनिया में एकमात्र रामसेतु का स्थान ऐसा है, जहां के पत्थर पानी में तैरते हैं। सवाल उठता है कि क्या ये पत्थर यहीं के हैं या कि इन्हें कहीं ओर से लाया गया था। कहीं ओर से लाया गया था तो वह स्थान कहां है? यहां स्थित चट्टानों और पत्थरों को बेचने पर रोक लगा रखी गई है फिर भी गाइडों के माध्यम से स्थानीय लोग चोरी-छुपे ये पत्थर बेचते हैं। आजकल ये पत्थर बहुत से संतों और कुछ लोगों के पास देखे जा सकते हैं। ऐसी मान्यता है कि रामसेतु या नलसेतु को बनाने के लिए जिन पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था वे पत्थर पानी में फेंकने के बाद समुद्र में नहीं डूबे, बल्कि पानी की सतह पर ही तैरते रहे। ऐसा क्या कारण था कि ये पत्थर पानी में नहीं डूबे? कुछ लोग इसे धार्मिक महत्व देते हुए ईश्वर का चमत्कार मानते हैं लेकिन साइंस इसके पीछे क्या तर्क देता है, यह बिलकुल विपरीत है। यह प्रक्रिया एक ऐसे पत्थर को जन्म देती है जिसमें कई सारे छिद्र होते हैं। छिद्रों की वजह से यह पत्थर एक स्पॉंजी यानी कि खंखरा आकार ले लेता है जिस कारण इनका वजन भी सामान्य पत्थरों से काफी कम होता है। इस खास पत्थर के छिद्रों में हवा भरी रहती है। यही कारण है कि यह पत्थर पानी में जल्दी डूबता नहीं है, क्योंकि हवा इसे ऊपर ही रखती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि नल तथा नील शायद जानते थे कि कौन सा पत्थर किस प्रकार से रखने से पानी में डूबेगा नहीं तथा दूसरे पत्थरों का सहारा भी बनेगा। वैज्ञानिकों ने रामसेतु पुल में इस्तेमाल हुए पत्थरों का वजूद खोज निकाला है। विज्ञान का मानना है कि रामसेतु पुल को बनाने के लिए जिन पत्थरों का इस्तेमाल हुआ था, वे कुछ खास प्रकार के पत्थर हैं जिन्हें 'प्यूमाइस स्टोन' कहा जाता है। दरअसल, ये पत्थर ज्वालामुखी के लावा से उत्पन्न होते हैं।

गंगा नदी

दुनिया में गंगा ही एकमा‍त्र ऐसी नदी है जिसका जल कभी सड़ता या खराब नहीं होता है। यह हमेशा शुद्ध बना रहता है, तभी तो अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा को पवित्र माना जाता है। ऐसा इसमें क्या है? इसका वैज्ञानिक आधार सिद्ध हुए वर्षों बीत गए। उसके अनुसार नदी के जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु गंगाजल में मौजूद हानिकारक सूक्ष्म जीवों को जीवित नहीं रहने देते अर्थात ये ऐसे जीवाणु हैं, जो गंदगी और बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। इसके कारण ही गंगा का जल नहीं सड़ता है। वैज्ञानिकों के लिए सवाल यह है कि ये जीवाणु आए कहां से? भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी गंगा का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। इसका जल घर में शीशी या प्लास्टिक के डिब्बे आदि में भरकर रख दें तो बरसो-बरस तक खराब नहीं होता है और कई तरह की पूजा-पाठ में इसका उपयोग किया जाता है। ऐसी आम धारणा है कि मरते समय व्यक्ति को यह जल पिला दिया जाए तो ‍उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगाजल में प्राणवायु की प्रचुरता बनाए रखने की अदभुत क्षमता है। इस कारण पानी से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियों का खतरा बहुत ही कम हो जाता है, लेकिन अब वह बात नहीं रही।


तनोट माता

सीमा पर स्थित तनोट माता की कृपा से यहां 3,000 बम बेअसर हो गए थे। राजस्थान की तनोट बॉर्डर पर हमारे सीमा सुरक्षा बल के जवान देश की हिफाजत के लिए तैनात रहते हैं। वहां हर पल खतरे की आशंका बनी रहती है। जरा-सी आहट होने पर पाकिस्तानी सैनिक फायरिंग शुरू कर देते हैं, लेकिन कहते हैं कि इस सीमा की रक्षा तनोट वाली माता करती हैं। तनोट माता का मंदिर जैसलमेर से करीब 130 किलोमीटर दूर भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के निकट स्थित है। यह मंदिर लगभग 1,200 साल पुराना है और तभी से यह लोगों की आस्था का केंद्र रहा है। लेकिन 1965 की भारत-पाकिस्तान लड़ाई के बाद यह मंदिर देश-विदेश में अपने चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध हो गया। तनोट माता को 'आवड़ माता' के नाम से भी जाना जाता है तथा यह हिंगलाज माता का ही एक रूप है। हिंगलाज माता का शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान में है। भारतीय सेना के इतिहास के अनुसार 1965 की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना ने इस क्षे‍त्र में करीब 3,000 बम गिराए थे जिसमें से 450 बम तो मंदिर परिसर में गिरे थे लेकिन इनमें से 1 भी बम फटा नहीं। और तो और, बम गिराने की इस घटना से मंदिर का बाल भी बांका नहीं हुआ, एक खरोंच तक नहीं आई। ये बम आज भी मंदिर परिसर में बने एक संग्रहालय में भक्तों के दर्शन के लिए रखे हुए हैं। इतना ही नहीं, एक बार फिर 4 दिसंबर 1971 की रात को पंजाब रेजीमेंट और सीमा सुरक्षा बल की एक कंपनी ने मां की कृपा से लोंगेवाला में पाकिस्तान की पूरी टैंक रेजीमेंट को धूल चटा दी थी और लोंगेवाला को पाकिस्तानी टैंकों का कब्रिस्तान बना दिया था। लोंगेवाला की विजय के बाद मंदिर परिसर में एक विजय स्तंभ का निर्माण किया गया, जहां अब हर वर्ष 16 दिसंबर को सैनिकों की याद में उत्सव मनाया जाता है। 1965 की लड़ाई के बाद इस मंदिर का जिम्मा सीमा सुरक्षा बल ने ले लिया और यहां अपनी एक चौकी भी बना ली।

रंग बदलता शिवलिंग :

 आपने शिवलिंग तो बहुत देखे होंगे लेकिन यह शिवलिंग देखकर एकबारगी तो आप भी चकरा जाएंगे। राजस्थान में एक जिला ऐसा भी है जहां स्थित हजारों साल पुराने मंदिर का शिवलिंग अपना रंग बदलता है। ऐसा अनोखा चमत्कार प्रतिदिन तीन बार होता है। सुबह में शिवलिंग का रंग लाल रहता है, दोपहर को केसरिया रंग का हो जाता है, और जैसे-जैसे शाम होती है शिवलिंग का रंग सांवला हो जाता है। यह चमत्कारी शिवलिंग राजस्थन के धौलपुर जिले में स्थित है।
घौलपुर जिला राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है। यह इलाका चम्बल के बीहड़ों के लिये प्रसिद्ध है। इन्हीं दुर्गम बीहड़ों के अंदर स्थित है, भगवान अचलेश्वर महादेव का मन्दिर। इस शिवलिंग के चमत्कार का रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया है। इस शिवलिंग कि एक और अनोखी बात यह है कि इस शिवलिंग के छोर का आज तक पता नहीं चला है। कहते हैं बहुत समय पहले भक्तों ने यह जानने के लिए कि यह शिवलिंग जमीं मे कितना गड़ा है, इसकि खुदाई की, पर काफी गहराई तक खोदने के बाद भी उन्हें इसके छोर का पता नहीं चला। अंत में उन्होंने इसे भग्वान का चमत्कार मानते हुए खुदाई बन्द कर दी। भारत ऐसे ऐसे कई चमत्कारिक शिवलिंग हैं।

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