सोमवार, 13 मार्च 2017

होली से जुडी पौराणिक कहानिया Holi related mythological stories


होली भारत के सबसे पुराने पर्वों में से है। यह कितना पुराना है इसके विषय में ठीक जानकारी नहीं है परंतु पौराणिक शास्त्रों में अनेक कथाएं मिलती हैं और हर कथा में एक समानता है कि असत्य पर सत्य की विजय और दुराचार पर सदाचार की विजय और विजय को उत्सव मनाने की बात कही गई है।

रंगोत्सव का शास्त्रीय आधारभूत: वायुमंडल में रंगों, पानी, कीचड़ अबीर व गुलाल का गुबार उड़ाकर हम देवताओं को इन रंगों के माध्यम से बुलाते हैं, ऐसा भाव रखकर हम देवताओं का स्वागत करते हैं। देवता के चरणों में नतमस्तक होना ही धूलिवंदन का उद्देश्य है। इस संदर्भ में भविष्य पुराण में ढुण्ढा नामक राक्षसी की पौराणिक कथा आती है। ढुण्ढा नामक राक्षसी गांव-गाव में घुसकर बालकों को कष्ट देती थी। उन्हें रोग व व्याधि से ग्रस्त करती थी। उसे गांव से भगाने के लिए लोगों ने अनेक प्रयास किए परंतु वे सफल नहीं हुए। अंत में लोगों ने उसे अपमानित और गालियां देकर  गांव से भगा दिया। 

उत्तर भारत में ढुण्ढा राक्षसी की बजाय होली की रात पूतना को जलाया जाता है। होली के पूर्व तीन दिन भगवान कृष्ण के बाल रूप को पालने में सुलाकर उनका उत्सव मनाते हैं। चैत्र पूर्णिमा पर पूतना का दहन करते हैं।

मदन का दहन: दक्षिण भारत के लोग कामदेव से विजय के प्रतीक के रूप में होलिका रंगोत्सव मनाते हैं। शास्त्रानुसार भगवान शंकर तपाचरण में मग्न थे। वे समाधिस्थ थे। उस समय मदन अर्थात कामदेव ने उनके अंत: करण में प्रवेश किया। उन्हें कौन चंचल कर रहा है, यह देखने हेतु शंकर ने नेत्र खोले और मदन को देखते क्षणभर में भस्मसात कर दिया अर्थात कामदेव को भस्म कर धुल में मिला दिया। होली अर्थात मदन का दहन। मदन अर्थात "काम" पर विजय प्राप्त करने की क्षमता होली में है; इसी भाव को लेकर होली का उत्सव मनाया जाता है।  

प्रहलाद और होलिका की कहानी
होली को लेकर यह कहानी सबसे प्रसिद्ध और प्रमाणिक कथा मानी जाती है. इस कहानी के अनुसार प्राचीन समय में दैत्यों का एक महाशक्तिशाली राजा था जिसका नाम हिरण्यकशिपु था. हिरण्यकशिपु विष्णु विरोधी था और अपने आप को इश्वर मानता था. उसके आदेशनुसार प्रजा का कोई भी व्यक्ति भगवान विष्णु की पूजा नहीं कर सकता था. ऐसा करने पर उन्हें मृत्युदंड दिया जाता. लेकिन उसका पुत्र प्रहलाद विष्णु भक्त था और अपने पिता के बार बार मना करने के बावजूद उसने भगवान विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी. फलस्वरूप हिरण्यकशिपु ने कई बार प्रहलाद को मारने की कोशिश की लेकिन विष्णु कृपा से वह हर बार बच जाता।

अंत में हिरण्यकशिपु ने भक्त प्रहलाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका की सहायता ली जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। आदेशनुसार होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर आग में बैठी। इश्वर कृपा से प्रहलाद को कुछ नहीं हुआ और होलिका स्वयं आग से जल गई। तब से इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में होलिका का दहन किया जाता है।


होली के साथ ढुण्ढा नामक राक्षसी की पौराणिक कथा
इस कहानी के अनुसार ढुण्ढा नामक राक्षसी गांव-गांव में घुसकर बालकों को कष्ट देती थी। उन्हें रोग व व्याधि से ग्रस्त करती थी|

उसे गांव से भगाने के लिए लोगों ने अनेक प्रयास किए परंतु वे सफल नहीं हुए अंत में लोगों ने उसे अपमानित और गालियां देकर गांव से भगा दिया| उत्तर भारत में ढुण्ढा राक्षसी की बजाय होली की रात पूतना को जलाया जाता है। होली के पूर्व तीन दिन भगवान कृष्ण के बाल रूप को पालने में सुलाकर उनका उत्सव मनाते हैं चैत्र पूर्णिमा पर पूतना का दहन करते हैं|  दक्षिण भारत के लोग कामदेव से विजय के प्रतीक के रूप में होलिका रंगोत्सव मनाते हैं|

शास्त्रानुसार भगवान शंकर जब तप करने में मग्न थे, उस समय मदन अर्थात कामदेव ने उनके अंत: करण में प्रवेश किया| उन्हें कौन चंचल कर रहा है? यह देखने हेतु शंकर ने नेत्र खोले और मदन को देखते ही क्षणभर में भस्मसात कर दिया अर्थात कामदेव को भस्म कर धुल में मिला दिया| इसलिए होली अर्थात स्वयं के काम, द्वेष, घमंड को समाप्त करने के भाव के साथ हम होलिका दहन करते है और प्रेम व भाईचारे की भावना के साथ होली के इस रंगों से सराबोर त्यौहार को मनाते है|

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