शनिवार, 27 मई 2017

युरोपा - बृहस्पति का वो उपग्रह जिस पर पानी है

युरोपा Europa


  युरोपा हमारे सौरमंडल के सबसे बड़े गृह बृहस्पति(Jupiter) के 67 उपग्रहों में से चौथा सबसे बड़ा उपग्रह है. इसका व्यास (डायामीटर) लगभग 3,138 किमी है जो हमारे चन्द्रमा से चंद किलोमीटर ही छोटा है।

युरोपा उपग्रह की खोज़ 8 जनवरी 1610 ईसवी में गैलीलीयो खोज़ ने की थी। हालांकि उन्होंने इस उपग्रह की खोज़ एक दिन पहले यानि कि 7 जनवरी को ही कर ली थी पर इस दिन उनके पास एक कम क्षमता वाली दूरबीन थी जिससे उन्हें युरोपा और बृहस्पति के एक अन्य उपग्रह लो के बीच अंतर ना पता चल सका।



क्यों है यूरोप उपग्रह खास

युरोपा उपग्रह इसिलए ख़ास है क्योंकि सभी वैज्ञानिक यह मानते है कि युरोपा पर एक विशाल पानी का समुंद्र है जिसकी गहराई 100 किलोमीटर से भी ज्यादा हो सकती है। ऐसा मानने के कई कारण है –
  • पहला तो युरोपा की सतह एक दम चिकनी लगती है और यह पृथ्वी पर बर्फ़ के समुंद्रों जैसी दिखती है। वैज्ञानिक मानते है कि युरोपा की उपरी सतह बर्फ़ से बनी है और इसके नीचे एक विशाल समुंद्र है। ( क्योंकि युरोपा पर तापमान बहुत कम है शायद इसलिए ऊपर रहने वाला पानी जम जाता है।)
  • युरोपा की प्रकाश को परिवर्तित करने की क्षमता (light reflectivity) 0.64 है जो कि पूरे सौर मंडल के सभी उपग्रहों में सबसे ज्यादा में से एक है। प्रकाश को परिवर्तित करने की इतनी क्षमता पानी के कारण ही हो सकती है।
  • युरोपा पर बहुत ज्यादा दरारे (cracks) है जिनमें बर्फ़ भरी हुई लगती है। वैज्ञानिक मानते है कि जब युरोपा घुमते घूमते बृहस्पति के नज़दीक आता है तो ज्वारी शक्ति (tidal forces) के कारण उसका पानी ऊपर उठता है, क्योंकि युरोपा की सतह ज़मी हुई बर्फ़ है इसलिए वो ऊपर उठ जाती है जो दूर से देखने पर एक दरार नज़र आती है।
  • युरोपा पर गड्ढे (क्रेटर) बेहद कम पाए गए है, जो इस बात का संकेत है युरोपा की सतह क्रियाशील है। दरासल लगभग सभी चट्टानी पिंडो पर उल्का आदि गिरने से बड़े – बड़े गड्ढ़े बन जाते है जिन्हें क्रेटर कहा जाता है। पर युरोपा पर गड्ढे इसलिए नही बने है क्योंकि जब कोई उल्का उस पर गिरता है तो वो बर्फ़ की सतह को तोड़ कर नीचे चला जाता है और फिर नीचे का कम तापमान वाला पानी ऊपर आकर फिर से जम जाता है।
  • बृहस्पति पर भेजे गए गैलीलीयो यान ने यह पता लगाया है कि युरोपा का एक कमज़ोर चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) है जो लगातार बदलता रहता है। यह इस बात का प्रमाण है कि युरोपा की सतह के निचे सुचालक पदार्थ मौजुद है – शायद नमकीन पानी का सागर।
  • साल 2013 में हब्बल दूरबीन द्वारा युरोपा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी के फुफ्हारे जैसी चीज़ देखी गई जो शायद पानी ही थी। 
इन सब बातों के मद्देनज़र अब वैज्ञानिकों को पूरा यकीन है कि युरोपा पर एक विशाल पानी का समुंद्र है जिसके नीचे चट्टानों की कठोर सतह है तो वहीं ऊपर जमी हुई बर्फ़ की परत।

यूरोपा पर जल की संभावना


    ऊपर दिए चित्र के दाहीने भाग मे पृथ्वी है, और उस पर नीला गोला पृथ्वी पर पानी की कुल मात्रा दर्शा रहा है। पृथ्वी की तीन चौथाई सतह पर पानी है लेकिन इसकी गहराई पृथ्वी की त्रिज्या(radius) की तुलना मे कुछ भी नही है। पृथ्वी के संपूर्ण पानी से बनी गेंद की त्रिज्या लगभग 700 किमी होगी।

चित्र मे बायें ओर युरोपा और उसपर पानी की मात्रा दिखायी गयी है। युरोपा मे पानी की मात्रा पृथ्वी पर पानी की मात्रा से भी ज्यादा है। युरोपा पर पानी उसकी सतह के नीचे लगभग 80-100 किमी की गहरायी तक है। युरोपा के पानी से बनी गेंद का व्यास 877 किमी होगा।

युरोपा का वायुमंडल

यूरोपा का एक बहुत ही पतला वायुमंडल है जिसमें अधिकतर आणविक आक्सीजन मौजूद है। इस वायु की तादाद इतनी कम है के पृथ्वी पर वायु का दबाव यूरोपा से दस खरब गुना ज़्यादा है।
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युरोपा
उपग्रह
जिस पर पृथ्वी से भी ज्यादा पानी

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